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क़ुरबानी

क़ुरबानी

, par Yasin Popatia, 1 min temps de lecture

जिस शख़्स में क़ुरबानी करने की ताकत हो फिर भी वह क़ुरबानी ना करे तो वह हमारी ईद-गाह के क़रीब न आऐ।
याद रहे! हर बालिग़, मुक़ीम,‌‌ मुसलमान मर्द व औ़रत, मालिक-ए-निसाब पर क़ुरबानी वाजिब है । जो लोग क़ुरबानी की इस्तित़ाअ़त रखने के बावुजूद अपनी वाजिब क़ुरबानी अदा नहीं करते उन के लिया लम्ह़ा-ए-फ़िक्रिया है । अव्वल यही ख़सारा (नुक़सान) क्या कम था कि क़ुरबानी न करने से इतने बड़े सवाब से मह़रूम हो गये । मज़ीद येह कि वो गुनाहगार और जहन्नम के ह़क़दार भी हुए । والعياذ بالله تعالى

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